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Monday, June 20, 2022

यादें - कविता #hindipoetry #poetry #हिन्दी #हिन्दीकविता

चलो सारा सामान जांच लेते हैं,


 एक और बार,


 सभी बक्सों में से,


 जो सालों से बंद है,


 धूल इकट्ठा करने में मशगूल,


 कोनों में,


 अलमारियों के ऊपर,


 पलंगों के नीचे,


 जहां भी उन्हें रहने या छिपने के लिए जगह मिली।


 कितने छोटे,


 और बड़ी चीजें,


 बक्सों में हैं,


 जो रखी थी,


 यह सोचकर कि जरूरत पड़ने पर,


 उन्हें निकाला जाएगा,


 लेकिन भूल गए,


 समय की अवधि में,


 उनको मौका मिला,


 धूल इकट्ठा करने को, 


 या आसपास मकड़ी के जाले उगाने को।

यादें - कविता #hindipoetry #poetry #हिन्दी #हिन्दीकविता
Photo credit: Winter Jefferson on VisualHunt



 कुछ दवाएं हो सकती हैं,


 कुछ शैंपू,


 या कुछ तेल,


 मसाले आदि



 एक बार खोल कर,


 प्रत्येक की जांच करना आवश्यक है,


 इतने सालों बाद,


 फेंकना भी जरूरी है,


 जो समाप्त हो चुके हैं,


 क्योंकि वे किसी काम के नहीं हैं,


 उन का उपयोग करना,


 अपना नुकसान करने के बराबर हो सकता है।



वैसे इस बहाने,


कुछ खाली जगह बन जाएगी,


जहां हम कुछ उपयोगी सामान रख सकेंगे,


 या उन बेकार बक्सों को फेंक कर,


 वहां पहुंचेगी ताजी हवा,


 और साथ-साथ कुछ खाली जगह बढ़ जाएगी।



 मुझे याद,


 मैंने एक बार कुछ कहा था,


 भावनाओं में इतना तेज,


 जिसने तुम्हें घंटों रुलाया था।



 ऐसी बहुत सी बातें,


 सालों पुरानी,


 मुझे अभी तक याद हैं।



 तुम्हे भी याद होंगी,


 मेरे बारे में ऐसी बहुत सी बातें,


 उनमें से कुछ,


 मन में कहीं दब चुकी होंगी,


 ऐसे ही, बक्सों में सामान की तरह, 


 वर्ष दर वर्ष।



 ये अधूरी पुरानी यादें,


 इतनी जगह घेर चुकी हैं,


 जिन में बहुत ऐसी हैं, जिनका, 


 कुछ करने को नहीं है,


 हमारे आज के जीवन के साथ,


 और हमारी खुशी से।



 फिर भी,


 वो पल पड़े हैं,


 पुरानी यादों से भरे हुए,


 कुछ जगह तो चाहिए होगी,


 याद में आज की मधुर अनुभूति रखने को,


 इसलिये,


 दिल और दिमाग में जगह बनानी है।



 वो डिब्बे, और,


 उनमें यादें,


 हानिकारक हो सकता है,


 अप्रभावी, या,


 अर्थहीन भी।


 हमें करने दो,


 एक बार फिर,


 उन बक्सों को खोलने का यत्न,


 जो धूल चाट रहे हैं


 हमारे दिलों,


 और दिमाग में,


 सालों से।



 चलो उनको खोलते हैं,


 आकलन करना,


 समाप्ति तिथि,


 उन सभी यादों की।

Thursday, December 16, 2021

कभी याद आये तो बुलाना #pebbleinwaterswrites #hindipoetry

 बरसों पहले

हम मिले पहली बार

जाने क्या सूझा तुम्हें

कि शाम के धुँधलाते चेहरे में

क्या दिखा तुम्हें कि 

तुमने चुपके से मेरा हाथ पकड़ा

बहुत मासूमियत से

और छत के एक कौने में हम बैठ गए

चुपचाप, बिना कुछ सुनने समझने की

कोशिश किए।

 

और जब उसने आ कर पूछा तुमसे

तो तुमने मासूमियत से जवाब दिया

"ओह! मुझे लगा ये वो है।"

अभी तक याद है मुझे वो लंबा समय 

जो कुछ ही पलों में सिमट कर

बहुत कुछ कह गया

और फिर वो जाने कहाँ बह गया।

 

तुझे याद है क्या वो अब तक?

है तो मुझे बुलाना 

अपनी खिड़की के पल्लू से

अटकती फूलों की डाल हिलाना।

कभी याद आये तो बुलाना #pebbleinwaterswrites #hindipoetry
Photo credit: CapCat Ragu on Visualhunt.com

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फिर एक और याद

उभर आयी 

उसी बचपन की

वोही मैं

एक कमरे के बाहर

खिड़की की सलाखों को

मासूम हाथों से पकड़े 

अपना अपना मुहँ उन सलाखों में दबाये

बिल्कुल चुपचाप, अचरज भरी निगाहों से

कमरे में रखे शीशे के बक्से में

रखी अलग अलग रंगों की

छोटी छोटी मछलियों को, निहारते।

 

कितना समय हम वहीं खड़े रहे

जड़ से, मंत्रमुग्ध, मुझे नहीँ याद

कब मेरी आंखें मछलियों से हट कर

तेरे चेहरे पर आ टिकी

सामने से भी खूबसूरत महीन

रंग बिरंगी मछलियाँ

मैंने देखी तेरे चेहरे पर, तेरी आंखों में

लहराती। 

 

क्या तुझे याद है? 

ये हमारी दूसरी और

आखिरी मुलाक़ात। 

 

याद है तो ज़रा अपनी खिड़की 

के पल्लू में अटकी हुई फूलों की

टहनियों को हल्के से हिलाना

और ज़मीन पर गिरे हुए फूलों को

समेट कर के एक कोने में

दीवार के साथ लगा कर

रख देना। 


उनके सूखने का, 

तेरे मिलने का, 

और अपने गुम होने का, 

हम तीनों मिल कर 

इंतजार करेंगे। 



Wednesday, April 14, 2021

कल करेंगे बात - गज़ल #BlogchatterA2Z #ghazal #ग़ज़ल

कल करेंगे बात आज रहने दे,
आज तेरे हुस्न के आशिक़ हैं बहुत।

जिसको देखें तेरी तारीफ़ बांधे बैठा है, 
तमाम महफ़िल में तेरे चर्चे हैं बहुत,

हरएक नूर फीका है तेरे नूर के आगे,
तेरे नूर के आगे सब बेनूर हैं बहुत।

ये अच्छी बात तेरे हिस्से में हैं 'आज', 
जितने भी हों, 'कल' भी आने हैं बहुत।

इस आज के होते कल को भूल ना जाना, 
उस कल के तोहफे भी मिलने हैं बहुत।


कल करेंगे बात - गज़ल #BlogchatterA2Z #ghazal #ग़ज़ल
Photo credit: amdolu on VisualHunt

कल भी महफिलें तो होंगी मगर कोई और,
उन महफिलों में आशिक़ भी होने हैं बहुत।

तब मगर तेरा हुस्न पड़ा होगा कहीं फीका सा,
तेरे ही ना होंगे यूँ तो होने ज़रूर हैं चर्चे बहुत।

जैसे तू आज है कल कोई और होगा नूर का टुकड़ा,
कल तुझे ही सताने ये आज के खयाल आयेंगे बहुत।

तारीफें कल भी होंगी, मगर किसी और की,
तू है? कहाँ है? ये सोचने वाले ना होने हैं बहुत।

ये आज के तोहफ़े तो सहेज कर रख जितने भी,
कल जो मिलने हैं वो होने सिर्फ़ दर्द हैं बहुत।

कल मैं आऊंगा तेरे पास एक दोस्त का कंधा बन के,
तू करना दर्द का साँझा, मेरे कंधे मज़बूत हैं बहुत।

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I’m participating in #BlogchatterA2Z - 2021

Wednesday, April 07, 2021

फ़ुरसतिया - एक कविता #BlogchatterA2z #हिन्दी #कविता #hindipoetry #hindi

कुछ ख़ास नहीँ है करने को बस फ़ुरसतिया रहे हैं।
इस दहलाने वाले माहौल में दिल को बहला रहे हैं।।

जानते हैं हालांकि ये कोशिश नाकाम है और रहेगी।
फिर भी खुद को इन्हीं बातों से महफ़ूज़ करा रहे हैं।।

तुम कहते हो सब ठीक है पर जानते हो कि नहीँ है।
ये हालात ही ऐसे हैं लगातार कमज़ोर बना रहे हैं।।

फ़ुरसतिया - एक कविता #BlogchatterA2z #हिन्दी #कविता #hindipoetry #hindi
Photo credit: FraVal Imaging on Visualhunt.com

झगड़ने की कोई वज़ह भी तो हो या फिर ऐसे ही।
बेवजह अंधेरे में जुगनू की रोशनी से भरमा रहे हैं।।

ये जो कहते हैं अपने को मसीहा ये करो ये ना करो।
वक़्त का फायदा उठा कर सब को बरगला रहे हैं।।

तुम भी और हम भी यूँ तो जानते हैं वक़्त खराब है।
और कुछ है भी नहीं सो इसी का साथ निभा रहे हैं।।

चेहरे की मायूसियों को देखने की कोशिशें फिजूल।
चेहरे के हर रंग को अब महज सब से छुपा रहे हैं।।

अब क्या बताऊँ ये फ़ुरसतियाना क्या फ़ुरसतियाना।
एक उम्मीद है जब कहें अच्छे से फ़ुरसतिया रहे हैं।।

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Tuesday, May 03, 2016

कौन है? - एक कविता

कौन है ?
जो मेरे अस्तित्व का हिस्सा है
और मुझे ही परास्त करने की होड़ में रहता है
मेरे ही साथ रहता है
लेकिन, न सुनता है
ना ही कुछ कहता है
एक मस्त हाथी की भांति
अपनी ही मौज में रहता है।

कौन है ?
कब से जानना चाहता हूँ
कौन बताएगा?
बाहर इतना शोर है
अंदर संपूर्ण मौन है।

कौन है ?
जो देखकर भी अनदेखा करता है
दिल के सर्द कोनों को
शब्दों की आंच से सेका करता है।

अनभिज्ञ नहीं हूँ मैं
इतना तो जानता हूँ
जो भी है
मेरे अंदर है
मेरा ही हिस्सा है।

शायद ये वो शब्द हैं
जो मेरे ज़हन में
तो रहते हैं
मगर अपने अर्थ तक
पहुँचने का रास्ता
भूल गए ,
या सही से पहचान ही
नहीं पाए।

कौन है ?
जो  शब्दों  की भीड़ में भी
अर्थ की मानिंद असहाय है,
मौन है।





Friday, December 25, 2015

My Wishlist For Santa जब आना इस बार


कुछ सवालों के जवाब देना
जब आना इस बार।

जुराबों में तो तोहफे भर दोगे
हर बार की तरह
मगर
हर दिमाग और दिल में
जो नफ़रतों का ज़हर
भरा है
उसे किसी तरह
जड़ों से उखाड़ जाना
जब आना इस बार।

फोटो आभार: गूगल 
This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.

Tuesday, September 29, 2015

ज़िन्दगी : दो पहलू

ज़िन्दगी,

तू कितने मायने बदलती है

तू  कितने चेहरे बदलती है

कभी बारिश से पहले की आग

कभी बारिश के बाद की उमस

इतनी लकीरों पर

एक साथ  कैसे फिसलती है
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ए ज़िन्दगी

एक बार तो मुझे आगोश में ले

एक बार तो मेरे चेहरे को सहला

एक बार तो मेरी आँखें पोंछ

और मुझे समझा तो सही

मुझे बारिश बनना हो

तो क्या करना होगा?
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Monday, April 20, 2015

कुछ अशआर : आज कुछ लम्हों के लिए मेरे पहलू में बैठ

आज
कुछ लम्हों के लिए मेरे पहलू में बैठ
मेरी आँखों में देख
कोई बात न कर
हो सके तो दिल की धड़कने भी
रोक लेते हैं दोनों
सिर्फ ख़ामोशी से
बता अपने दिल की ज़ुबान

तेरे दिल के ज़ख्म
मेरे दिल का गुबार
एक मुकम्मल मुलाक़ात
के मुल्तजी हैं
तेरे ज़ख्म भरने के लिए
मेरे आँसू बदहवास हैं

आज
कुछ लम्हों के लिए
सब भूल कर
बस
मुझे देख
मुझसे बात कर
इन कुछ लम्हों को
एक ज़िन्दगी का
जामा हासिल करा

Tuesday, March 10, 2015

कुछ अशआर अनकहे

कुछ तो हर्फों ने बगावत की होती
कुछ तूने भी इजाज़त दी होती
यूँ ही अशआर न बने होते
बुतों के अब्र भी न खड़े होते

सब्र कुछ इस हद तक बढ़ा होता
सन्न सी हो गयी आँखें होती
परस्तिश की इक आदत होती
पेशानी पर ख्वाब की तस्वीरें होती

तेरे होने न होने से फ़र्क़ तो होता
सन्नाटा होता तो भी बेफिक्र होता
हवाओं में तेरी खुशबू तो होती
दरख्तों को हर शाम बेकरारी होती


मैं युहीं तो नहीं तेरे दरवाज़े पर
आज भी हरेक पल दस्तक  देता हूँ
बरसों बाद भी खुले तो सामने तू  ही हो
कुछ अशआर अनकहे
कुछ इबादतें अनचुकी





Monday, July 08, 2013

कविता: सरहद - २

मेरी छत  पर मैं उड़ाता पतंग
और तुम अपनी छत  पर
फासला कुछ ज्यादा नहीं है
तुम्हारे और मेरे घर के बीच
पर फिर भी इतना ज्यादा
की हम तुम कुछ कदम चल कर
इक दुसरे के घर जा नहीं सकते
क्यूंकि
मुद्दा एक सरहद का है
जो एक लकीर के ज़रिये
हमारे घरों के बीच
एक विशाल दीवार बना देती है
जो बनी है नफरत के मिटटी गारे से ।

कभी सोच कर देखा है किसी ने
मेरी और तुम्हारी पतंगें 
सब सरहदों, नफरतों, और कौमों
से आज़ाद हैं और निडर भी
ना ये आसमान में एक दुसरे को चूमने से
डरती हैं, न इन्हें किसी फौजी की गोली का डर है।

और हम तुम इसी बहाने एक दुसरे को छु लेते है
जब मेरी पतंग तुम्हारी छत पर तुम्हारे हाथों में
और कभी तुम्हारी पतंग कट कर मेरे हाथों में ।

ये हवाएं किस कदर कमज़ोर साबित कर देती हैं
इन मजबूत सरहदी लकीरों को
कौमों को
और नफरतों को।





कविता: सरहद - १

सरहद के उस पार खड़ा फ़ौज का जवान उतना ही नागवार लगता है 
जितना इस पार से दूसरी और!
फर्क सिर्फ इतना ही होता है कि 
एक लकीर है जो इतना फर्क पैदा कर देती है 
नफरतों के ढेर सा | 

मगर ये सरहदों को बांटती इस लकीर की ताकत उतनी ही होती है 
जितनी आसमान से चींटी से दीखते उस लकीर के इधर 
या उधर अपनी अपनी सीमा की रक्षा करते हुए 
फौजी | 

कभी सोच कर देखो अगर तुम उस पार की बजाय 
इस पार जन्मे होते 
तो क्या तब अपनी कौम के लोगों से, जो अभी तुम्हारी कौम नहीं है,
इतनी ही नफरत करते?
या फिर तब तुम उनसे नफरत करते जो अभी तुम्हारी कौम है?
कभी सोच कर तो देखो। 




Saturday, June 22, 2013

Poetry: That Innocent Little Girl: १३ बरस की मासूम लड़की

वो अकेले खड़ी थी गुमसुम सबके बीच 
१३ बरस की मासूम लड़की 
माँ बाप भाई बहन सबके होते हुए भी 
अनाथ सी 

बाप रिक्शा खींचने की जगह दारू में लिप्त 
माँ लोगों के घरों में काम करते करते घिसती हुई 
बड़ी बहन जाने कहाँ दुनिया में खोते हुए 
घर में रहते हुए भी घर से दूर होते हुए 
बड़ा भाई घर को छोड़ दोस्तों को अपनाता हुआ 
सबके होते हुए भी वो अनाथ सी 

रात उसके बाप ने उसकी कीमत लगा दी 
शहर के एक अमीर बदनाम आदमी को 
अपनी छोटी मासूम बच्ची बेच दी 
आज उसी के घर में उसकी शादी है 
उस अमीर बूढ़े शख्स के साथ 

सब तो हैं उसके आस पास 
फिर भी वो अनाथ है 
मासूम बच्ची 

This entry is for the Ring The Bell Campaign for IndiChange/ IndiBlogger - Bell Bajao.

Thursday, June 20, 2013

प्यार गुस्सा या दूध

तुम अगर 'क्या' से पहले 
बता दो 'कितना'
तो आसान हो जाता है
आकार तय करना 

फिर चाहे 
प्यार हो या गुस्सा 
या फिर दूध की थैली  
पहले से 
तय्यारी 
हो सकती है

Sunday, March 03, 2013

छोटी बच्ची और खिलौना

वो बचपन की निश्चलता 
वो बेफिक्री का माहौल 
वो हँसता खेलता आँगन 
वो मुस्कुराती गलियां 
वो खिलखिलाता मोहल्ला
वो खिलोनो का खनकना 
वो पेड़ों पर चिड़ियों का चहकना  

फिर अचानक ऐसा क्या हुआ 
कि जो अब तक नहीं था 
वो सब अचानक से दिखने लगा 
और दिखते दिखते बढता चला गया 
माँ की आँखों में डर में लिपटा दर्द
मोहल्ले के मर्दों की आँखों में चमक 
अनकही बातें अनकहे किस्से 

सब हंसी ठठे और खिलखिलाहट 
वो चिड़ियों की चहचाहट 
वो बेफिक्र माहौल वो खनखनाते खिलौने 
सब एक दम सन्नाटे में तब्दील हो गए 
मेरे सकूं के दिन बचपन के साथ कहाँ खो गए 
बेख़ौफ़ लम्हे कितने दहशतगर्द और ग़मगीन हो गए 


This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda

Sunday, October 14, 2012

तू कभी गौर कर या न कर मेरी आँखों में

अपने पहलू में बैठने का कभी मौका दे दे
थोडा प्यार तो कर चाहे बाद में धोका दे दे

दो चार कदम साथ चल न चल मेरे साथ
चाँद को चांदनी बिखेरने का हौसला दे दे 

जज़्बात की कदर कौन चाहता है अब 
मेरी ख़ामोशी को इज़हार का दर्ज़ा दे दे 

शहर के दरमियाँ भी मज़ार बनती है
आने जाने वालों को मगर थोडा रास्ता दे दे

अपने बुतखाने पर आने की मनाही ही सही
थोड़ी देर के लिए परस्तिश की इजाज़त दे दे

तू कभी गौर कर या न कर मेरी आँखों में
अपनी आँखों की रेत को समंदर दे दे

Sunday, September 23, 2012

अपनी आँखों की रेत को समंदर दे दे

अपने पहलू में बैठने का कभी मौका दे दे


थोडा प्यार तो कर चाहे बाद में धोका दे दे


दो चार कदम साथ चल न चल मेरे

चाँद को चांदनी बिखेरने का हौसला दे दे 


जज़्बात की कदर कौन चाहता है अब 

मेरी ख़ामोशी को इज़हार का दर्ज़ा दे दे 


शहर के दरमियाँ भी मज़ार बनती है

आने जाने वालों को मगर थोडा रास्ता दे दे


अपने बुतखाने पर आने की मनाही ही सही

थोड़ी देर के लिए परस्तिश की इजाज़त दे दे


तू कभी गौर कर  न कर मेरी आँखों में

अपनी आँखों की रेत को समंदर दे दे

Monday, September 17, 2012

अपनी ख़ामोशी को जब तक सुन सको

तुम्हे अगर यकीन है की तुम हो
तो तुम हो
कोई और माने या ना माने
ये ज़रूरी नहीं
तुमको जब तक है यकीन तब तक
तो तुम हो

जो सुना तुमने अपने कानो से सुना
जो देखा अपनी आँखों से
तो फिर किसी और की दिखाई राह पर
चलना क्यूँ हो

अपने दिल की
अपनी ख़ामोशी की
अपने दिमाग की
सुनो
और जब तक ये
सुन सको
तो यकीन रखो कि अपनी ताकत
तो तुम हो

अपनी ख़ामोशी को जब तक सुन सको
याद रखना की तुम
तुम ही हो

Saturday, August 04, 2012

प्यार थोड़ा सा उम्र भर का


वो अक्सर अपने ख्यालों में गुम रहती थी| उसका अपना इस दुनिया में लगभग कोई नहीं था| जो दूर दराज़ के रिश्तेदार थे वो भी उसके गलत 'धंदे' की वजह से उस से कन्नी काटते थे| वो बहुत सुन्दर थी ऐसा नहीं कह सकते परन्तु बदसूरत थी ऐसा भी नहीं था| उसका एक कमरे का घर बहुत ज्यादा सामन समेटे हुए नहीं था मगर साफ़ सुथरा था| कमाई के लिए वो पास के एक रेस्तोरांत में रसोई में काम करती थी. 

वो इलाके का नामी गुंडा था लेकिन गरीबों की बस्ती में सब उसे बहुत चाहते थे क्यूंकि वो जितना भी पैसा गोलमाल से कमा कर लाता था सब गरीबों में बाँट देता था. बच्चों में वो ख़ास चहेता था| उसका भी दुनिया में अपना कहने को कोई नहीं था| लूटपाट का काम, सिगरेट और शराब के अलावा उसमें बाकी और कोई ऐब नहीं था| वो लम्बा कद और गंभीर स्वभाव का था लेकिन बच्चों के संग बच्चा बन जाता था|

वो बहुत कम बोलती थी इसीलिए उसके आसपास रहने वालों में से भी काफी लोगों को उसका नाम भी नहीं मालूम था| जिन्हें मालूम था वो उसे रूपा के नाम से बुलाते थे. वो बहुत बोलता था और ठाट से रहता था| सब उसे राजा के नाम से जानते थे| कुल मिला कर बस्ती में सभी लोग रूपा और राजा को चाहते थे| सब ने जोर लगा कर न दोनों को आपस में शादी करने के लिए मना लिया| काफी जोर के बाद राजा रूपा से मिलने के लिए राज़ी हुआ था और मिलने के बाद उसे भी लगा की ये लड़की उसके लिए ठीक है| असलियत में ज़िन्दगी में पहली बार उसने किसी लड़की को गौर से देखा था और शायद इसलिए उसे ज्यादा सोचना नहीं पड़ा और उसने हाँ बोल दी| रूपा ने भी बस्ती के बड़े बुजुर्गों के समझाने के बाद हाँ कह दी लेकिन राजा के लिए उसने गलत काम छोड़ने की शर्त रखी| जाने कैसे राजा ने भी एक दम से उसे मान लिया|

सात साल ४ बच्चे और खुशगवार घर का माहौल - ये सब बना कर दिया रूपा ने काम छोड़ने के बाद और सारा ध्यान घर पर लगाने पर| राजा ने इमानदारी से बस्ती के पास एक स्टोर की देख रेख का काम शुरू किया था शादी के बाद और सेठ उसके काम और उसकी इमानदारी से काफी खुश रहते हुए उसे लगातार तरक्की देता रहा. राजा के चरों बच्चों की पड़ी के खर्चे का ज़िम्मा सेठ ने अपने ऊपर लिया और आज बच्चे शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पड़ते है|

www.facebook.com/LoveYaArrange.

तुम आओ मिलो बैठो हसो तो अचछा लगता है

मुश्किलें आसान यूँ ही नहीं हो जाती हैं

किताबें खुद ब खुद हर्फे बयान नहीं हो जाती हैं



समंदर कश्तियों के कारोबार से बेखबर है 

ये तो लहरें हैं जो टकरा के भी नहीं खो जाती हैं



तुम आओ मिलो बैठो हसो तो अचछा लगता है

तुम सदियों ना मिलो तो भी चाहतें नहीं सो जाती हैं

Wednesday, July 04, 2012

एक प्यार ऐसा भी

एक  प्यार  ऐसा भी तो होता होगा
शाख पर खिले नाज़ुक से पत्ते लहलहाते मुस्कुराते हुए ।
बिना  तेज़ धुप या बारिश की परवाह किये
रात और दिन से बेख़ौफ़
हवाओं की ताल से ताल मिलते हुए ।।


एक प्यार ऐसा भी तो होता होगा
घुप्प अँधेरे में ज़मीन के नीचे
मिटटी में दबे दबे
बिना अपने दर्द की परवाह किये
बिना अपने वजूद की चाह लिए
बेइंतहा प्यार देना जैसे एक फ़र्ज़ हो ।
सिर्फ इसलिए की मुझ से जुड़े
ज़मीन के ऊपर शाख पर
लहलहाते पत्ते बेख़ौफ़ बेफिक्र
हवा के झोंकों से खेलते रहे ।।
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