Sunday, March 03, 2013

छोटी बच्ची और खिलौना

वो बचपन की निश्चलता 
वो बेफिक्री का माहौल 
वो हँसता खेलता आँगन 
वो मुस्कुराती गलियां 
वो खिलखिलाता मोहल्ला
वो खिलोनो का खनकना 
वो पेड़ों पर चिड़ियों का चहकना  

फिर अचानक ऐसा क्या हुआ 
कि जो अब तक नहीं था 
वो सब अचानक से दिखने लगा 
और दिखते दिखते बढता चला गया 
माँ की आँखों में डर में लिपटा दर्द
मोहल्ले के मर्दों की आँखों में चमक 
अनकही बातें अनकहे किस्से 

सब हंसी ठठे और खिलखिलाहट 
वो चिड़ियों की चहचाहट 
वो बेफिक्र माहौल वो खनखनाते खिलौने 
सब एक दम सन्नाटे में तब्दील हो गए 
मेरे सकूं के दिन बचपन के साथ कहाँ खो गए 
बेख़ौफ़ लम्हे कितने दहशतगर्द और ग़मगीन हो गए 


This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda
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