Sunday, September 23, 2012

अपनी आँखों की रेत को समंदर दे दे

अपने पहलू में बैठने का कभी मौका दे दे


थोडा प्यार तो कर चाहे बाद में धोका दे दे


दो चार कदम साथ चल न चल मेरे

चाँद को चांदनी बिखेरने का हौसला दे दे 


जज़्बात की कदर कौन चाहता है अब 

मेरी ख़ामोशी को इज़हार का दर्ज़ा दे दे 


शहर के दरमियाँ भी मज़ार बनती है

आने जाने वालों को मगर थोडा रास्ता दे दे


अपने बुतखाने पर आने की मनाही ही सही

थोड़ी देर के लिए परस्तिश की इजाज़त दे दे


तू कभी गौर कर  न कर मेरी आँखों में

अपनी आँखों की रेत को समंदर दे दे
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