Tuesday, May 03, 2016

कौन है? - एक कविता

कौन है ?
जो मेरे अस्तित्व का हिस्सा है
और मुझे ही परास्त करने की होड़ में रहता है
मेरे ही साथ रहता है
लेकिन, न सुनता है
ना ही कुछ कहता है
एक मस्त हाथी की भांति
अपनी ही मौज में रहता है।

कौन है ?
कब से जानना चाहता हूँ
कौन बताएगा?
बाहर इतना शोर है
अंदर संपूर्ण मौन है।

कौन है ?
जो देखकर भी अनदेखा करता है
दिल के सर्द कोनों को
शब्दों की आंच से सेका करता है।

अनभिज्ञ नहीं हूँ मैं
इतना तो जानता हूँ
जो भी है
मेरे अंदर है
मेरा ही हिस्सा है।

शायद ये वो शब्द हैं
जो मेरे ज़हन में
तो रहते हैं
मगर अपने अर्थ तक
पहुँचने का रास्ता
भूल गए ,
या सही से पहचान ही
नहीं पाए।

कौन है ?
जो  शब्दों  की भीड़ में भी
अर्थ की मानिंद असहाय है,
मौन है।





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