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Monday, June 20, 2022

यादें - कविता #hindipoetry #poetry #हिन्दी #हिन्दीकविता

चलो सारा सामान जांच लेते हैं,


 एक और बार,


 सभी बक्सों में से,


 जो सालों से बंद है,


 धूल इकट्ठा करने में मशगूल,


 कोनों में,


 अलमारियों के ऊपर,


 पलंगों के नीचे,


 जहां भी उन्हें रहने या छिपने के लिए जगह मिली।


 कितने छोटे,


 और बड़ी चीजें,


 बक्सों में हैं,


 जो रखी थी,


 यह सोचकर कि जरूरत पड़ने पर,


 उन्हें निकाला जाएगा,


 लेकिन भूल गए,


 समय की अवधि में,


 उनको मौका मिला,


 धूल इकट्ठा करने को, 


 या आसपास मकड़ी के जाले उगाने को।

यादें - कविता #hindipoetry #poetry #हिन्दी #हिन्दीकविता
Photo credit: Winter Jefferson on VisualHunt



 कुछ दवाएं हो सकती हैं,


 कुछ शैंपू,


 या कुछ तेल,


 मसाले आदि



 एक बार खोल कर,


 प्रत्येक की जांच करना आवश्यक है,


 इतने सालों बाद,


 फेंकना भी जरूरी है,


 जो समाप्त हो चुके हैं,


 क्योंकि वे किसी काम के नहीं हैं,


 उन का उपयोग करना,


 अपना नुकसान करने के बराबर हो सकता है।



वैसे इस बहाने,


कुछ खाली जगह बन जाएगी,


जहां हम कुछ उपयोगी सामान रख सकेंगे,


 या उन बेकार बक्सों को फेंक कर,


 वहां पहुंचेगी ताजी हवा,


 और साथ-साथ कुछ खाली जगह बढ़ जाएगी।



 मुझे याद,


 मैंने एक बार कुछ कहा था,


 भावनाओं में इतना तेज,


 जिसने तुम्हें घंटों रुलाया था।



 ऐसी बहुत सी बातें,


 सालों पुरानी,


 मुझे अभी तक याद हैं।



 तुम्हे भी याद होंगी,


 मेरे बारे में ऐसी बहुत सी बातें,


 उनमें से कुछ,


 मन में कहीं दब चुकी होंगी,


 ऐसे ही, बक्सों में सामान की तरह, 


 वर्ष दर वर्ष।



 ये अधूरी पुरानी यादें,


 इतनी जगह घेर चुकी हैं,


 जिन में बहुत ऐसी हैं, जिनका, 


 कुछ करने को नहीं है,


 हमारे आज के जीवन के साथ,


 और हमारी खुशी से।



 फिर भी,


 वो पल पड़े हैं,


 पुरानी यादों से भरे हुए,


 कुछ जगह तो चाहिए होगी,


 याद में आज की मधुर अनुभूति रखने को,


 इसलिये,


 दिल और दिमाग में जगह बनानी है।



 वो डिब्बे, और,


 उनमें यादें,


 हानिकारक हो सकता है,


 अप्रभावी, या,


 अर्थहीन भी।


 हमें करने दो,


 एक बार फिर,


 उन बक्सों को खोलने का यत्न,


 जो धूल चाट रहे हैं


 हमारे दिलों,


 और दिमाग में,


 सालों से।



 चलो उनको खोलते हैं,


 आकलन करना,


 समाप्ति तिथि,


 उन सभी यादों की।

Thursday, December 16, 2021

कभी याद आये तो बुलाना #pebbleinwaterswrites #hindipoetry

 बरसों पहले

हम मिले पहली बार

जाने क्या सूझा तुम्हें

कि शाम के धुँधलाते चेहरे में

क्या दिखा तुम्हें कि 

तुमने चुपके से मेरा हाथ पकड़ा

बहुत मासूमियत से

और छत के एक कौने में हम बैठ गए

चुपचाप, बिना कुछ सुनने समझने की

कोशिश किए।

 

और जब उसने आ कर पूछा तुमसे

तो तुमने मासूमियत से जवाब दिया

"ओह! मुझे लगा ये वो है।"

अभी तक याद है मुझे वो लंबा समय 

जो कुछ ही पलों में सिमट कर

बहुत कुछ कह गया

और फिर वो जाने कहाँ बह गया।

 

तुझे याद है क्या वो अब तक?

है तो मुझे बुलाना 

अपनी खिड़की के पल्लू से

अटकती फूलों की डाल हिलाना।

कभी याद आये तो बुलाना #pebbleinwaterswrites #hindipoetry
Photo credit: CapCat Ragu on Visualhunt.com

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फिर एक और याद

उभर आयी 

उसी बचपन की

वोही मैं

एक कमरे के बाहर

खिड़की की सलाखों को

मासूम हाथों से पकड़े 

अपना अपना मुहँ उन सलाखों में दबाये

बिल्कुल चुपचाप, अचरज भरी निगाहों से

कमरे में रखे शीशे के बक्से में

रखी अलग अलग रंगों की

छोटी छोटी मछलियों को, निहारते।

 

कितना समय हम वहीं खड़े रहे

जड़ से, मंत्रमुग्ध, मुझे नहीँ याद

कब मेरी आंखें मछलियों से हट कर

तेरे चेहरे पर आ टिकी

सामने से भी खूबसूरत महीन

रंग बिरंगी मछलियाँ

मैंने देखी तेरे चेहरे पर, तेरी आंखों में

लहराती। 

 

क्या तुझे याद है? 

ये हमारी दूसरी और

आखिरी मुलाक़ात। 

 

याद है तो ज़रा अपनी खिड़की 

के पल्लू में अटकी हुई फूलों की

टहनियों को हल्के से हिलाना

और ज़मीन पर गिरे हुए फूलों को

समेट कर के एक कोने में

दीवार के साथ लगा कर

रख देना। 


उनके सूखने का, 

तेरे मिलने का, 

और अपने गुम होने का, 

हम तीनों मिल कर 

इंतजार करेंगे। 



Wednesday, October 06, 2021

Those Moments #MyFriendAlexa #pebbleinwaterswrites #poetry

Many years ago,
during our childhood,
we met for the first time.
I don't know what flashed in your mind,
in the foggy face of the evening,
what did you feel, that
you secretly held my hand
very innocently
and we sat down in a corner, on the terrace boundary,
silently,
without any effort of listening or understanding
the silence between us,
and within.

Someone came and asked you
"What's going on?"
you answered innocently
"Oh! I thought it was him."
I still remember that long time,
which, in a few moments,
said a lot, so silently,
and then vanished in a void.

Do you remember that till now?

If yes, call me
from your window sill
shake the branch of stuck flowers.


Another memory of yours
emerged,
same childhood,
me and you,
outside a room,
stuck to
the window bars
in the back lane
holding with innocent hands
peeping inside with
utter silence, and astonishing eyes
soaked in the aquarium kept in the room,
having different colors
of little fish
dancing in a rhythm.
How long we stood there,
mesmerized, I do not remember,
when my eyes turned away from the fish
and got stuck on your face.
Life became finer in those moments.
I could see
colorful fish
on your face, in your eyes,
wavy and glittery.

Do you remember?
That was our second
and the last meeting.
If you also still remember,
go to your window
having flowers outside,
just shake the twigs lightly
and the flowers that have fallen on the ground,
place them in a corner,
by the wall,
and let
those flowers dry,
I will wait
to meet you,
or lose.

All three of us together,
at our respective places,
will wait.

I neither remember your face,
nor your name.
But I still remember those little caring
hands and that innocent touch.
That silence and those colorful fish
on your face.

Photo credit: pedrosimoes7 on VisualHunt

I am taking my blog to the next level with Blogchatter’s My Friend Alexa

Monday, June 21, 2021

मुस्कुराते रहिए - #ghazal #ग़ज़ल #हिन्दी

खुश रहिए ना रहिए, मुस्कुराते रहिए।
किसी भी हाल में रहिए, मुस्कुराते रहिए।।

क्या कहा, हाल यहाँ हो गया बेहाल आपका?
यकीं करे ना करे कोई, मुस्कुराते रहिए।।

कत्ल करने का शौक़ रखते हैं अगर आप।
खंजर की नहीं ज़रूरत, मुस्कुराते रहिए।।

अटका था कोई अश्क पुराना जो बह गया।
मकाँ हो गया फ़िर खाली, मुस्कुराते रहिए।।

खामोशी हुआ तकाज़ा, जो रिश्ते हुए कमज़ोर।
ये वक़्त की है मार, मुस्कुराते रहिए।।

This post is a part of #BlogchatterHalfMarathon hosted by Blogchatter.

Wednesday, April 07, 2021

फ़ुरसतिया - एक कविता #BlogchatterA2z #हिन्दी #कविता #hindipoetry #hindi

कुछ ख़ास नहीँ है करने को बस फ़ुरसतिया रहे हैं।
इस दहलाने वाले माहौल में दिल को बहला रहे हैं।।

जानते हैं हालांकि ये कोशिश नाकाम है और रहेगी।
फिर भी खुद को इन्हीं बातों से महफ़ूज़ करा रहे हैं।।

तुम कहते हो सब ठीक है पर जानते हो कि नहीँ है।
ये हालात ही ऐसे हैं लगातार कमज़ोर बना रहे हैं।।

फ़ुरसतिया - एक कविता #BlogchatterA2z #हिन्दी #कविता #hindipoetry #hindi
Photo credit: FraVal Imaging on Visualhunt.com

झगड़ने की कोई वज़ह भी तो हो या फिर ऐसे ही।
बेवजह अंधेरे में जुगनू की रोशनी से भरमा रहे हैं।।

ये जो कहते हैं अपने को मसीहा ये करो ये ना करो।
वक़्त का फायदा उठा कर सब को बरगला रहे हैं।।

तुम भी और हम भी यूँ तो जानते हैं वक़्त खराब है।
और कुछ है भी नहीं सो इसी का साथ निभा रहे हैं।।

चेहरे की मायूसियों को देखने की कोशिशें फिजूल।
चेहरे के हर रंग को अब महज सब से छुपा रहे हैं।।

अब क्या बताऊँ ये फ़ुरसतियाना क्या फ़ुरसतियाना।
एक उम्मीद है जब कहें अच्छे से फ़ुरसतिया रहे हैं।।

This post is powered by Blogchatter. I’m participating in #BlogchatterA2Z - 2021

Saturday, December 28, 2019

हिंदी कविता चलो! एक बार फिर दिखाता हूँ समुन्दर में बूँद नहीं बूँद में समुन्दर बन कर

चलो बैठते हैं बैठ जाते हैं
बैठ ही जाते हैं
चलने को तो ज़माने में बहुत कुछ है
वक़्त भी है
हवा है।

नफरत है
तल्खियां हैं
गुस्ताखियां हैं
गुस्सा है
तुम में मुझ में बढ़ती दूरियां हैं
तन्हाइयां हैं
आक्रोश है
रुसवाईआं हैं
बढ़ती हुई दवाइयां हैं।

बैठे बैठे
बैठे ही रह गए
चलना भूल गए
कुछ बचे खुचे ख्वाब
पुरानी जीर्ण  यादों के
घने जालों में
असहाय और लाचार से
झूल गए।

मगर ठहरना ज़रा
इन मायूस बुझी आँखों में
एक चमक दिखती है कहीं
इस जूझते दीये में
बुझती आग की आब से
रौशनी दिखती है कहीं
चलो! एक बार फिर
दिखाता हूँ
समुन्दर में बूँद नहीं
बूँद में समुन्दर बन कर
अब तुम ठहरो
मैं चलता हूँ।



तू अब भी शांत दरिया है मेरे ख्यालों में बहने देना


बात आधी ही रखना आधी रहने देना
फिर मिलने का इक बहाना रहने देना।

हाथ चाहे थाम कुछ देर तक टहल लेना
मंज़िल को एक साथ छूने की चाहत अभी रहने देना।

गले मिल कर एक दुसरे के कंधे जो भिगोये थे हमने
सबब आंसुओं का था या पसीने का, ये सवाल रहने देना।

वो लम्हे अब भी तनहा हैं जब हम साथ थे पर पास ना थे
उन लम्हों के जज़्बात समझने की कोशिश अब रहने देना।

तुम्हारी किताब में मेरी बरसों पुरानी मुस्कुराती तस्वीर
आँखों में बिना आंसू लाये देखना मुस्कराहट रहने देना।

सफर अभी पूरा कहाँ हुआ, अभी मंज़िल बाकी है
उम्मीद है क्यूंकि सांस है अभी, छोड़ने का ख्याल अभी रहने देना।

सवाल अब भी वोही हैं मेरे ज़हन में कंकड़ जैसे
तू अब भी शांत दरिया है मेरे ख्यालों में बहने देना।

कुछ धुंधली बातें ठहरी ठहरी सी

कुछ बातें ठहरी ठहरी सी 
कुछ उथली पुथली गठरी सी
कुछ सागर जैसी गहरी सी
कुछ बातें ठहरी ठहरी सी।


सब ठहर सा जैसे जाता था
जब तुमसे मिलना होता था
वो वक़्त न जाने कहाँ गया
जो हाथ में पकड़ा था सब कुछ
सब रेत की मानिंद फिसल गया
अब वक़्त भी ऐसे भागता है
जग सोता है दिल जागता है
अब सब कुछ धुंदला धुंधला सा 


तुम अब भी बिलकुल वैसी हो
मैं सोच-सोच मुस्काता हूँ
वो आंखें गहरी गहरी सी
कुछ बातें ठहरी ठहरी सी।


क्या सचमुच तुम वैसी ही हो?
वैसे ही गुमसुम रहती हो?
या अपने से ही बातें कर
दूर कहीं खो जाती हो?
भागते भागते रूकती हो
फिर रुकते रुकते भागती हो
जब तक मेरा चेहरा न दिखे
क्या अब भी उदास हो जाती हो?



वो आँखों में इक गीलापन
वो बातों में इक अल्हड़पन
ज्यूँ चंचल एक गिलहरी सी
कुछ बातें ठहरी ठहरी सी।




शायद

हालाँकि मालूम होता है
की अगली या उस से अगली लहर
मिटा देगी सब कुछ




शायद वो वैसे ही रहता हो
बस ऐसा लगता हो



शायद दूर कहीं
आसमान और ज़मीं मिलते हो
सच में।

तेरे आने का गुमान

कुछ ऐसा हो
तेरे आने से कुछ पल पहले
तेरे आने का 
गुमान हो जाए




फिर
तेरे आने का
किसी को भी
कुछ गुमान न हो


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