Monday, March 12, 2012

Poetry: औरत और माँ

भाषा संवारते संवारते
कहीं संस्कारों को मत भूल जाना
तुम जहाँ कहीं भी हो
अपने भारत की मर्यादा मत भूल जाना

तुम जो इस ज़मीन पर हो 
तो उसका श्रेय एक औरत को जाता है 
जो तुम्हारी माँ है

उस माँ की कसम तुम्हे 
किसी भी औरत की मर्यादा भंग 
करने की कोशिश मत करना

बोलो कसम खाते हो 
मेरे साथ

Friday, March 09, 2012

ये आस्मां तुम्हारा है तुम ले लो

ये आस्मां तुम्हारा है तुम ले लो

मुझे बस ज़मीन से एक कण दे दो




इसी कण में में एक नया आस्मां उगाऊंगा


तुम चाहो तो उसे भी तुम ले लेना




बस मुझे अपनी ज़मीन का एक कण और दे देना


ये हम उम्र भर करते रहे तो कोई गम नहीं




तुम अपने आसमानों में खुश रहना


में एक कण में कितने आस्मां बसा लूँगा
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